भ्रूण झिल्ली क्या होता है?HealthPlanet

Posted on Thu 2nd Mar 2023 : 13:31

भ्रूण को सुरक्षा देने वाली झिल्ली को लेकर एक अहम शोध हुआ है। लंदन की क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने साबित किया है कि यह झिल्ली किसी कारणवश क्षतिग्रस्त होने पर खुद ही उसे ठीक कर लेती है। शोध का यह निष्कर्ष साइंटिफिक रिपोर्ट्स जर्नल में प्रकाशित हुआ है।

बता दें कि गर्भावस्था के दौरान भ्रूण का आवरण बनकर उसे सुरक्षा देने वाली इस झिल्ली की अखंडता भ्रूण के सामान्य विकास में काफी अहम होता है। लेकिन यह झिल्ली संक्रमण, रक्तस्त्राव या यहां तक कि गर्भावस्था के दौरान होने वाली कई तरह की जांच के दौरान भी क्षतिग्रस्त हो जाती है। फिलहाल इस झिल्ली में होने वाले घाव के भरने या उसकी मरम्मत की प्रक्रिया तेज करने की कोई क्लिनिकल विधि उपलब्ध नहीं है। इसके साथ ही यह भी पता नहीं था कि यदि इस झिल्ली में छोटी सी भी छेद हो जाए तो वह उसे भरने में खुद ही सक्षम है। अब इस शोध से उसकी खुद मरम्मत की प्रक्रिया को जानकर उसे और अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।

इसकी प्रक्रिया जानने के लिए नानयांग टेक्निलाजिकल यूनिवर्सिटी, सिंगापुर तथा यूनिवर्सिटी हास्पिटल्स ल्यूवेन, बेल्जियम के शोधकर्ताओं की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने दान में मिली एक इंसानी भ्रूण की झिल्ली के ऊत्तकों में सूई के जरिये एक छोटा सा घाव पैदा किया। इसके कुछ दिनों के बाद शोधकर्ताओं ने पाया कि घाव भरने में अहम भूमिका निभाने वाली कोशिकाओं, जिसे मायोफिब्रोब्लास्ट (एमएफएस) कहते हैं, की आबादी वहां अचानक से बढ़ गई और घाव को भरने के लिए उसकी तरफ अग्रसर हो रही थीं। इन कोशिकाओं से पैदा हुए कोलाजेन ने जख्म वाले किनारे को खींचना और ऊत्तकों को सिकुड़ना शुरू कर दिया, जिससे घाव भरने लगे।

यह निष्कर्ष इस मामले में पहले किए गए एक शोध के संदर्भ में था। उसमें जख्म भरने की प्रक्रिया में कोन्नेक्सिन 43 (सीएक्स43) की अहमियत को दर्शाया गया था। लेकिन ताजा शोध में यह दर्शाया गया कि सीएक्स43 की अभिव्यक्ति दो तरह की कोशिकाओं- एमनियोटिक मेसेनकाइमल सेल (एएमसी) तथा एएफएस के जरिये होती है और इनमें सीएक्स43 का स्तर अलग-अलग था। यह भी पाया गया कि इस प्रोटीन की मात्रा ज्यादा होने से कोशिकाओं के जख्म वाले स्थान तक पहुंचने तथा घाव भरने की क्षमता प्रभावित होती है।

क्वीन मैरी में रीजेनेरेटिव मेडिसिन की सीनियर लेक्चरर डाक्टर टीना चौधरी ने बताया कि हम अक्सर सोचते थे कि इंसानों की भ्रूण झिल्ली में छोटा सा भी घाव हो जाने से उसका खुद से भरना बहुत ही कम होता है, लेकिन इस शोध ने दर्शाया है कि उन ऊत्तकों में जख्म भरने की क्षमता होती है।

उन्होंने बताया कि यह पाया गया कि सीएक्स43 का झिल्ली में पाए जाने वाली कोशिकाओं की आबादी पर अलग-अलग तरह से असर पड़ता है तथा एएमसी को एमएफसी में बदलने में तेजी लाने के साथ ही भ्रूण की झिल्ली की तरफ बढ़ने और जख्म को भरने में सक्रिय भूमिका निभाता है।

भ्रूण की झिल्ली का समय से पहले ही फटने को प्रीटर्म प्रीलेबर रप्चर आफ मेंब्रेन्स (पीपीआरओएम) कहते हैं और यह समय पूर्व बच्चों के जन्म का एक बड़ा कारण है और नवजात मृत्युदर में इसका हिस्सा 40 फीसद तक होता है। इसलिए भ्रूण की झिल्ली की सफल मरम्मत प्रसव संबंधी जटिलताओं की जोखिम को कम कर सकता है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि भ्रूण झिल्ली में खुद की मरम्मत या जख्म भरने की क्षमता होने का यह निष्कर्ष पीपीआरओएम का इलाज विकसित करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। इससे बच्चों के समय पूर्व जन्म को रोकने की दिशा में बड़ी सफलता की उम्मीद की जा सकती है।

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